नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल डेटा एनालिसिस और सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं है, बल्कि भावनात्मक (इमोशनल) मामलों में भी इंसानों की बराबरी, बल्कि कई मामलों में उनसे बेहतर प्रदर्शन कर रही है। डरहम यूनिवर्सिटी और मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी की एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि इमोशनल सपोर्ट देने के मामले में AI चैटबॉट कई परिस्थितियों में इंसानों से बेहतर साबित हुए हैं।

इस रिसर्च में 1,200 से अधिक लोगों को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान ChatGPT-4o, Claude 3.5 Sonnet और Gemini 1.5 Pro जैसे AI मॉडल्स के जवाबों की तुलना इंसानों द्वारा दिए गए जवाबों से की गई।

गुस्से और डर की स्थिति में AI रहा बेहतर

स्टडी के अनुसार, गुस्से और डर जैसी भावनात्मक परिस्थितियों में AI चैटबॉट्स ने ज्यादा प्रभावी और संतुलित जवाब दिए। इन चैटबॉट्स ने लोगों को शांत महसूस कराने और सकारात्मक सोच विकसित करने में भी मदद की। हालांकि, जब बात उदासी (Sadness) से जुड़ी परिस्थितियों की आई, तो AI और इंसानों के जवाब लगभग समान पाए गए।

रिसर्च में यह भी सामने आया कि जब किसी समस्या का व्यावहारिक समाधान बताने की बात आई, तब AI चैटबॉट्स अधिक उपयोगी साबित हुए। उन्होंने ब्रीदिंग एक्सरसाइज, तनाव कम करने के तरीके और अन्य जरूरी सुझाव विस्तार से दिए।

AI और इंसानों के बीच अब भी है बड़ा अंतर

रिसर्चर्स ने साफ किया कि यह अध्ययन केवल लिखित और संक्षिप्त जवाबों पर आधारित था। इसमें यह नहीं देखा गया कि लंबे समय तक AI पर भावनात्मक रूप से निर्भर रहने के क्या असर हो सकते हैं।

डरहम यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता डॉ. सारा वॉकर ने कहा कि AI आपको टहलने या खुद का ख्याल रखने की सलाह दे सकता है, लेकिन कोई दोस्त या परिवार का सदस्य आपके साथ चल सकता है, आपका साथ दे सकता है और बातचीत खत्म होने के बाद भी आपकी मदद करता रहता है। यही इंसानों और AI के बीच सबसे बड़ा फर्क है।

AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता ठीक नहीं

विशेषज्ञों का मानना है कि AI हमारी कई समस्याओं का समाधान आसान बना रहा है, लेकिन इस पर पूरी तरह निर्भर होना सही नहीं है। इससे पहले आई एक अन्य स्टडी में भी पाया गया था कि जो लोग AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहते हैं, वे नई चीजें सीखने में कमजोर पड़ सकते हैं और धीरे-धीरे अपनी सोच और जानकारी पर उनका भरोसा कम होने लगता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, AI एक उपयोगी सहायक हो सकता है, लेकिन भावनात्मक और सामाजिक जीवन में इंसानी साथ और संवेदनशीलता की जगह अभी भी कोई तकनीक नहीं ले सकती।

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